भगवान नृसिंह जी के मंदिरों में लीलाओं का मंचन, जन्मोत्सव पर विशेष अनुष्ठान, ये है विधि और पौराणिक कथा

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फोटो साभार राजस्थान पत्रिका

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भगवान नृसिंह जी के मंदिरों में लीलाओं का मंचन, जन्मोत्सव पर विशेष अनुष्ठान, ये है विधि और पौराणिक कथा

भगवान श्री नरसिंह जी का जन्मोत्सव शनिवार 14 मई 2022 को नरसिंह मंदिर में मनाया जा रहा है। राजस्थान के पुष्कर में भी भगवान नरसिंह जी का मंदिर है। जयपुर बीकानेर जोधपुर और अन्य शहरों में भी भगवान नरसिंह जी के प्रसिद्ध मंदिर प्रतिष्ठित है। इसके साथ ही दक्षिण भारत में कई जगह पर भगवान नरसिंह जी के विशाल मंदिर आज के दिन सजे हुए हैं। नरसिंह लीलाएं मंचित की जा रही हैं। इसी प्रकार पूरे भारत के विभिन्न राज्यों में विभिन्न शहरों में प्रतिष्ठित भगवान नरसिंह के मंदिरों में आज विशेष पूजा अनुष्ठान किए जा रहे हैं। बहुत से मंदिरों में मेले का सा माहौल है। सूर्यास्त के समय इन मंदिरों में भगवान नरसिंह जी की लीलाएं होती है। बीकानेर में थी डागा चौक स्थित भगवान नरसिंह जी का मंदिर लखोटिया का चौक स्थित भगवान नरसिंह जी का मंदिर नथूसर गेट के बाहर और अन्य जगहों पर प्रतिष्ठित मंदिरों में सुबह से ही दर्शनार्थियों की रेलमपेल है। भगवान नरसिंह जी का विशेष रूप से अभिषेक कर शृंगारित स्वरूप के दर्शन करने के उद्देश्य से दूर-दूर से भक्त मंदिरों में पहुंच रहे हैं। भगवान नरसिंह जी की लीलाएं गाई भी जा रही है। भजनों की गूंज बनी हुई है। श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर भगवान से मन्नत भी मांगी है। वही जिनकी मन्नत विगत दिनों में पूरी हुई है वह अपनी श्रद्धा के अनुसार दान पुण्य भी कर रहे हैं।

  • समस्त बाधाओं का शमन
  • ऐसे करें पूजा
  • ये है पौराणिक कथा
  • भक्त प्रह्लाद का जन्म
  • होलिका का उद्धार
  • भगवान नृसिंह जी का अवतरण
  • ब्रर्ह्माजी का अटल सत्य वरदान कायम
  • हिरण्यकशिपु का अंत

भगवान श्री नृसिंह जन्मोत्सव आज : पूजा-अर्चना से होगा समस्त बाधाओं का शमन


भारतीय संस्कृति के हिन्दू सनातन धर्म में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करके व्रत-उपवास रखने की धार्मिक व पौराणिक मान्यता है। वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान श्री
नृसिंह का प्राकट्य महोत्सव मनाने की धार्मिक व
पौराणिक मान्यता है। इस बार भगवान श्री नृसिंह
जन्मोत्सव 14 मई, शनिवार को मनाया जा रहा है।
वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 14 मई,
शनिवार को सायं 3 बजकर 24 मिनट पर लगेगी,
जो कि 15 मई, रविवार को दिन में 12 बजकर 46 मिनट तक रहेगी। 14 मई, शनिवार को चतुर्दशी तिथि का मान होने से व्रत-उपवास इसी दिन रखकर भगवान नृसिंह की पूजा-अर्चना की जाएगी। मान्यता है आज के दिन श्री नृसिंह भगवान का व्रत-उपवास रखकर पूजा-अर्चना करने से शत्रुओं पर विजय के साथ ही सुख-समृद्धि और वैभव की भी प्राप्ति होती है।

ऐसे करें पूजा—

प्रात:काल ब्रह्म मूहूर्त में अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होना चाहिए। तत्पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के बाद श्री नृसिंह भगवान के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। लकड़ी की नवीन चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर श्री नृसिंह भगवान की मूर्ति को स्थापित कर उनका श्रृंगार करके मध्याह्न काल में पूजा-अर्चना करने का विधान है। व्रतकर्ता को चाहिए कि अपनी दिनचर्या नियमित संयमित रखते हुए भगवान श्री नृसिंह जी को ऋतुफल, नैवेद्य, विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्न आदि अॢपत करके धूप- दीप के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्री नृसिंह भगवान के प्रतिष्ठित मन्दिर में पूजा-अर्चना करके दान-पुण्य करना अत्यन्त फलकारी है। नृसिंहपुराण में वर्णित व्रत-कथा सुननी चाहिए, रात्रि में जागरण करके कीर्तन के साथ पूजा-अर्चना करने की विशेष महिमा है। आज के दिन ब्राह्मण को यथाशक्ति नववस्त्र, स्वर्ण, रजत, गौ एवं तिल तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना विशेष पुण्य फलदायी रहता है।

ये है पौराणिक कथा—

एक समय कश्यप नाम के ऋषि थे, राजा दक्ष ने अपनी दो पुत्रियों अदिति और दिति का विवाह उनके साथ किया था। दिति के गर्भ से उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे का हिरण्यकश्यप था। पृथ्वी की रक्षा के हेतु भगवान विष्णु ने वराह अवतार में हिरण्याक्ष को मार दिया था। अपने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या करके अजेय होने का वरदान मांग लिया कि वह न उसे कोई मनुष्य और न ही कोई पशु मार पाए। उसकी मृत्यु न दिन में हो और न रात में, वह न जल में न थल में मारा जाए। वरदान प्राप्त होने के बाद से स्वर्ग पर भी अधिकार कर अपनी प्रजा पर अत्याचार करने लगा।

भक्त प्रह्लाद का जन्म

हिरण्यकश्यपु की पत्नी कयाधु के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम प्रहलाद रखा गया। एक राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी प्रहलाद भगवान नारायण का परम भक्त था। वह सदैव हरि का नाम जपता रहता था और भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। अपने पिता द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का विरोध करता था। हिरण्यकश्यप को प्रहलाद का विष्णु की भक्ति में लीन रहना कतई पसंद नहीं था। उसने नारायण भक्ति से हटाने के लिए कई प्रयास किए परंतु भक्त प्रहलाद के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कई बार प्रहलाद को मारने के प्रयास किए गए परंतु भगवान विष्णु सदैव अपने भक्त को बचा लेते थे। प्रहलाद अपने पथ से विचलित नहीं हुआ। वह अपने पिता को सदा यही कहता था कि आप मुझ पर कितना भी अत्याचार कर लें मुझे नारायण हर बार बचा लेंगे।

होलिका का उद्धार

इन बातों से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अपनी बहन होलिका की गोद में बैठाकर जिंदा जलाने का प्रयास किया। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। लेकिन जब प्रहलाद को होलिका की गोद में बिठा कर अग्नि में बैठी तो उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई लेकिन प्रहलाद बच गए। इस घटना के बाद हिरण्यकश्यप को अत्यधिक क्रोध आ गया। एक दिन हिरण्यकश्यप ने कहा कि तू नारायण नारायण करता फिरता है, बता कहां है तेरा नारायण। प्रहलाद ने जवाब दिया पिताजी मेरे नारायण इस सृष्टि के कण कण में व्याप्त हैं।

भगवान नृसिंह जी का अवतरण

क्रोधित हिरण्यकश्यपु ने कहा कि ‘क्या तेरा भगवान इस खंभे में भी है? प्रह्लाद के हाँ कहते ही हिरण्यकश्यपु ने खंभे पर प्रहार कर दिया तभी खंभे को चीरकर भगवान विष्णु आधे शेर और आधे मनुष्य रूप में नृसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए। उस समय न दिन का समय था न रात का वह दोनों बेला के मिलन का समय था। उन्होंने न हिरण्यकश्यप को न जल में मारा न थल में, उन्होंने अपनी गोद में लेकर हिरण्यकश्यपु का वध किया। न ही उन्होंने घर के भीतर और न बाहर न अस्त्र से न शस्त्र से बल्कि चौखट के बीचो-बीच अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। इस तरह से भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा भी की और ब्रह्माजी के वरदान मान भी रखा।
युगपक्ष – ✍🏻 ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन

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